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मंगलवार, 11 मई 2021

दिल की बुरी नहीं हूं मैं

हैलो दोस्तों, कैसे है आप.. 
आज कुछ स्कूल के उन दोस्तों के नाम जिनके लिए "मै चाय जैसी थी..किसी को बहुत पसंद और किसी को बिल्कुल नापसंद"
दुनिया में हर तरह के लोग होते है...और हमें इनकी वैरायटी तब मिलना शुरू हो जब हम अपना पहला कदम स्कूल में रखते है। वहां हर तरह के बच्चे होते है... पहले पहले तो सब ठीक होता है लेकिन चीज़ें वहां से बदलना शुरू हो जाती है, जहा दूसरे बच्चों को आपके गुण और दोष पता लग जाते है।
फिर सिलसिला शुरू होता है पसंद और न पसंद का, अब इसमें एक आसान सा गणित है की जो बच्चा जैसा होगा उसको वैसे ही बच्चे पसंद आयेंगे।
हम इंसानों में एक बहुत बुरी आदत होती है.. की हम हर दूसरे इंसान से खुद की तुलना करने लगते हैं और फिर जिस सांचे में हम फिट नहीं बैठते उससे हम कटना शुरू हो जाते है मतलब उसे दूर होने लगते है। इसको हम ऐसे समझ सकते है...अब अगर कोई नया बच्चा क्लास में आए और वो इंटेलिजेंट हो तो पहले वाले पढ़ाकू बच्चे उससे चिड़ने लगते है क्योंकि उन्हें ऐसा लगने लगता है की अब उनकी सत्ता छिन जाएगी। फिर वो बच्चे अपने मन की भड़ास निकालने के लिए उस नए बच्चे को बहुत सारे नाम दे देते है, जैसे:- घमड़ी, सडू, अकंडू, अड़ियल, सेलफिश और न जाने क्या क्या...?
हालांकि इससे कोई ख़ास फ़र्क नही पड़ता लेकिन उन बच्चो को आत्मसंतुष्टि हो जाती है। लेकिन वो जो नया बच्चा है उसके लिए ये थोड़ा अजीब होता है... बहुत असहज महसूस होता है लेकिन थोड़े टाइम बाद आदत पड़ जाती है, या यूं कह लो की वो अपने आपको उस माहौल में ढाल लेता है।
ये सब मेरा व्यक्तिगत अनुभव है... ऐसा मेरे साथ अक्सर हुआ है, हालांकि मैं भी जानती क्यों...क्योंकि मैं तो इंटेलिजेंट भी नहीं थी.. लेकिन आज कुछ उन सब लोगो के लिए जो मुझे ऐसा समझते थे लेकिन "I was not like that" तो गौर फरमाइए:
"दिल की बुरी नहीं हूं बस लफ्जों में थोड़ी शरारत लिए फिरती हूं,
भावुक भी हूं थोड़ी मैं, और बहुत ज्यादा ज़िद्दी हूं,
कभी खिलखिलाकर मुस्कुराती हूं, तो कभी बिना बात के ही रो देती हूं,
मैं खुद को खुद मैं खोकर अपनी तलाशी किया करती हूं,
दिखावे वाली इस दुनिया में थोड़ी सादी सी और सिंपल हूं,
हां पर किसी की खुशी के लिए कभी कभी एक छोटी बिंदी लगाया करती हूं,
कभी कभी पलकों को झुकाएं, मैं थोड़ा सा शर्माती हूं,
पायल की इस झंकार से मैं अपने गीत मिलाया करती हूं,
हां लेकिन दिल की बुरी नहीं हूं बस लफ्जों में थोड़ी शरारत लिए फिरती हूं।
सुहानी सी काली रातों में मैं सपनों को अपने बुनती हूं,
कभी कभी फिर सपनों में मैं पंख लगाए उड़ती हूं,
कभी जो मिल जाए मनपसंद सी चीज़ कोई,
तो फिर मैं बच्चो सी उछलती हूं,
जिंदगी की रंगीन शाम में फिर मैं जुगनू सी चमकती हूं,
कर पाऊं अगर किसी के लिए कुछ मैं,
तो फिर सर्दियों वाली सुनहरी धूप सी मैं खिलती हूं,
जिंदगी की इस कश्ती में मैं फिर डूबकर भी तैर जाती हूं,
कभी खुद को देखूं आईने में कभी मैं, तो कभी मेहंदी वाले हाथ से आखें ढकती हूं,
कभी कभी फिर मैं अपने लिए थोड़ा सजती और संवरती हूं,
हां लेकिन, दिल की बुरी नहीं हूं बस लफ्जों में थोड़ी शरारत लिए फिरती हूं।।
बच्ची हूं आज भी थोड़ी मैं, पर थोड़ी समझदारी भी लिए फिरती हूं,
रिश्तों की उस मजबूत डोर को आज भी मैं कस के पकड़ती हूं,
आज भी कभी कभी मैं अंधेरों से डरती हूं, 
पूरे करने है जो सपने , उनकी मैं लंबी लिस्ट बनाए फिरती हूं,
आज भी उस तारों के शहर की चाहत लिए मैं, रातों को भी जगती हूं,
हां लेकिन  दिल की बुरी नहीं हूं बस लफ्जों में थोड़ी शरारत लिए फिरती हूं।।






 

शनिवार, 8 मई 2021

ज़िम्मेदारी

"मां" हां ये वही है जिसको सुनते ही एक 60 साल का बुजुर्ग व्यक्ति भी अपने आप को छोटा बच्चा महसूस करने लगता है। दरअसल ये शब्द ही इतना ज्यादा प्यारा है सब को कि कभी हम कुछ हो तो भी सब से पहले मां शब्द ही निकलता है मुंह से..और हम परेशान हो, दर्द में हो तब भी मां ही सबसे पहले याद आती हैं।।

"वो किसी ने कहा है ना कि भगवान हर जगह नहीं हो सकते थे इसलिए उन्होंने मां को बनाया"
बिल्कुल सही कहा है, जिंदगी में सब कुछ हो और मां ना हो तो सब अधूरा सा हो जाता है। मां है तो दुनिया की सारी खुशियां हमारी हो जाती है।
आज भी हमारे बीच कुछ लोग है जो अपने मां पापा को इज्जत नहीं देते..उन्हे वो मान सम्मान नही देते जिनके वो हकदार है। बहुत ज्यादा गुस्सा, बुरा व्यवहार, और अत्याचार करते है वो अपने मां पापा पर... उनको लगता है कि उन्होंने उनके लिए कुछ नहीं किया और अगर किया भी है तो वो उनकी ड्यूटी थी।। सच मे कितने बेवकूफ़ है वो.. जिस चीज को वो ड्यूटी समझते है वो उनकी ममता होती है और रही बात ड्यूटी की तो ...फिर कुछ ड्यूटी बच्चो की भी तो होती है... तो क्या वो उन्हें पूरा कर रहे हैं, अगर इसका जवाब मिल जाए तो खुद सोचना कि उन्होंने अपने मां पापा के लिए क्या किया है?

मै सिर्फ़ इतना ही कहना चाहती हूं ऐसे लोगो से की जिनके साथ तुम रह रहे हो ना, जिन्होंने तुम्हे चलना सिखाया है, कंधे पर बैठा कर दुनिया दिखाई है, वो सिर्फ़ मां बाप नहीं हैं .. वो भगवान है। तुम खुशनसीब हो जो यही उनके दर्शन हो गए। इसलिए उन्हें वो सब दो जिसके वो हकदार है। आज का ये लेख उन लोगो के लिए ख़ास तौर पर लिखा गया है जिनको अपने मां बाप की कोई अहमियत समझ नहीं आती। हर पल उन्हें सिर्फ यही लगता है की उनके मां बाप उनके लिए जो कुछ भी कर रहे है वो कोई अहसान नहीं है बल्कि ये तो उनकी ड्यूटी है जो हर मां बाप करते है। 
बहुत नासमझ है वो लोग जिनको कभी समझ ही नही आता कि मां बाप भगवान का दिया हुआ वो तोहफ़ा होते है, जो सब के नसीब में नहीं होते। इसलिए इनके लिए हम जितना करे उतना कम है।


ये मेरी एक कोशिश थी उन लोगो को समझने की जिनको मां बाप सिर्फ और सिर्फ अपने ऐशो आराम का साधन लगते है। अगर अभी भी कुछ लोगो को समझ नहीं आया तो मैं कुछ पंक्तियों के माध्यम से एक कोशिश और करना चाहूंगी। तो गौर फरमाएं शायद समझ आ जाए:-

एक छोटा सा घर है हमारा, मगर उसे बनाने में खूब पसीने बहाए है,
चूल्हे की आंच पर रोटियां पकाते हुए, कई बार मां ने अपने हाथ भी जलाए है,
ज़िम्मेदारी के बोझ ने कुछ ऐसे दिन भी दिखाए है,
की सालों तक त्यौहार मां ने एक ही साड़ी में मनाए है।।

दो समय की रोटी के लिए, मां ने कई दिन सिर्फ पानी पीकर बिताए है,
बच्चे भूखे ना सो जाए इसलिए भारी भारी बोझ भी उठाए है,
जी हां, ज़िम्मेदारी के बोझ ने कुछ ऐसे दिन भी दिखाए है,
की सालों तक त्यौहार मां ने एक ही साड़ी में मनाए है।।

बहुत मुश्किल था वो दौर, उस दौर में शायद ही दो पैसों की बचत हो पाए, लेकिन  फिर भी जैसे तैसे करके मां ने वो बचाए है,
मेरे बच्चो का भविष्य बहुत सुनहरा हो, रातों को जाग कर मां ने ये सपने सजाए है,
जी हां, ज़िम्मेदारी के बोझ ने कुछ ऐसे दिन भी दिखाए है,
की सालों तक त्यौहार मां ने एक ही साड़ी में मनाए है।।

एक बार यूंही देखे मैने उनके हाथ, उनके हाथों में बहुत सारी दरारें है,
हमारी परवरिश के लिए,  बेशर्त उन्होंने अपने सुंदर हाथ भी बिगड़े है,
हमारे सारे सपने पूरे हो, इसलिए उसने अपने सारे सपने दांव पर लगाए है,
अपनी पसंद, अपने शौक सब छोड़ दिया उसने, कहती है की मुझे मेरे बच्चे उन सब से प्यारे है,
जी हां, ज़िम्मेदारी के बोझ ने कुछ ऐसे दिन भी दिखाए है,
की सालों तक त्यौहार मां ने एक ही साड़ी में मनाए है।।
जिंदगी की इस तपती राह पर हमारे लिए, उसने अपने पांव जलाए है, 
पीठे की वो मिठाई जो उन्हे बहुत पसंद है, उसके लिए बचाए पैसे भी हमारे आने वाले कल के लिए बचाए है
जी हां,  ज़िम्मेदारी के बोझ ने कुछ ऐसे दिन भी दिखाए है,
की सालों तक त्यौहार मां ने एक ही साड़ी में मनाए है।।

जब जब मैंने खुद को मुश्किलों से घेरा है, तब तब मैंने अपनी मां को मेरे साथ खड़ा हुआ पाया है, 
भगवान को देखा नहीं कभी मैंने लेकिन, वो मेरी मां ही है जिसने उनके होने का अहसास कराया है,
बहुत किया है उन्होंने मेरे लिए, लेकिन अब मुझे उनके लिए कुछ करके दिखाना है,
जो कुछ भी छोड़ा उन्होंने मेरे लिए वो उन्हें वापिस भी तो दिलाना है...
इन्हीं जिम्मदारियों के कारण ऐसा होता आया है,
की सालों तक हर त्यौहार मां ने एक ही साड़ी में मनाया है।।

बुधवार, 5 मई 2021

आत्मग्लानि

हैलो दोस्तों...कैसे है आप?
उम्मीद करती हूं आप अपना और अपनो का ख्याल बखूबी रख रहे होगें...
दोस्तों, बहुत से लोग होते है जिनसे मिलकर आपको लगेगा कि वो बहुत ज्यादा जिद्दी है, या बहुत ज्यादा गुस्से वाले है... या कभी कभी हम उन्हे घमंडी भी समझ लेते है...लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि हम कभी कभी लोगो को बहुत ज्यादा जल्दी जज कर लेते है... और ये मान लेते है की हमें उनसे कोई वास्ता नहीं रखना चाहिए।

लेकिन कई बार वो नहीं बल्कि उनके बारे में हम गलत होते है। दरअसल हमें सब को एक जैसा देखने की आदत हो गई है इसलिए हम उन अलग से लोगो को पचा नहीं पाते। क्योंकि वो लोग हमारी दिखावे की दुनिया का हिस्सा नहीं होते, झूठ से उन्हें नफरत होती है, धोखा से वो कोसों दूर होते है, और अपने फायदे के लिए उन्हें किसी को नीचा दिखाना नहीं आता... हां थोड़े सडू हो सकते है... गुस्सा भी नाक पर हो ये भी हो सकता है.. लेकिन दोस्तों मेरे हिसाब से ऐसे इंसान हमारे समाज के लिए ज्यादा अच्छे है...क्योंकि इन्हें अपने फायदे के लिए गिरगिट बनना नहीं आता.... लेकिन आज के इस दोगले समाज में इस प्रकार के लोग बहुत ज्यादा अकेलापन और पिछड़ा हुआ महसूस करते है।

क्योंकि आज कल के दिखावे से ये लोग कोसो दूर होते है और समाज में आज वही अपना पैर जमा लेता है जो दिखावे से भरा हुआ है। आज कल लोगो को सच सुनने की आदत नहीं रही लेकिन ये लोग तो सिर्फ और सिर्फ सच बोलते है। आज कल लोगो को अपनी निंदा सुनने की आदत नहीं रही, लेकिन ये लोग तो जो बोलना होता है वो मुंह पर बोल देते है।आज कल लोगो को झूठी तारीफों से बड़ा मोह है, लेकिन ये लोग ऐसा कर पाने में असमर्थ होते है। 

सबसे बड़ी परेशानी इनको यही होती है कि आजकल का समाज इनको स्वीकार नहीं पाता और न ये इस दिखावे वाले और दोगले समाज का हिस्सा बनना चाहते है। इसलिए कभी कभी ये लोग ऐसी स्थिति का सामना करते है जब ये अपने आपको दुनिया से बिल्कुल कटा हुआ महसूस करते है।  बाकी आप इन पंक्तियों से भी समझ सकते है जो किसी ऐसे ही इंसान पर लिखी गई हैं:-

भर जाती हूं आत्मग्लानि से,
जब कभी सोचती हूं कि मैं पिछड़ गई हूं,
हर उस इंसान से जो दिखावा करता है,
मन दुखी हो जाता है, जब कभी मैं उस दिखावे का हिस्सा नहीं बन पाती,
लोगो की तरह बाहर कुछ और अंदर कुछ नहीं हो पाती।।

भर जाती हूं आत्मग्लानि से,
जब कभी ये पाती हूं की अकेली रह गई हूं,
दूर हो गई हूं हर उस इंसान से जो धोखा करता है,
बहुत परेशान हो जाती हूं, जब किसी को धोखे मे नहीं रख पाती,
हां, जब लोगो की तरह किसी की पीठ में छुरा नही घोंप पाती।।

भर जाती हूं आत्मग्लानि से,  
जब कभी सोचती हूं की मैं कितनी गरीब हो गई हूं,
लोगो को देखा है पैसे के लिए कुछ भी करते हुए,
मन उदास हो जाता है जब कभी मैं इस मुहिम का हिस्सा नहीं बन पाती,
हां, मैं पैसों के लिऐ किसी के तलवे नहीं चाट पाती।।

भर जाती हूं आत्मग्लानि से,
जब कभी सोचती हूं की दुनिया से बहुत अलग रह गई हूं,
हर उस इंसान से अलग जो किसी को नीचा दिखाना चाहता है,
मन बैचेन हो जाता है, जब मैं किसी को नीचा नहीं दिखा पाती,
हां, दुनिया की इन उम्मीदों पर मैं खरा नहीं उतर पाती।।

हां बहुत जिद्दी हूं, हर किसी की हां में हां नहीं मिला पाती,
दिमाग़ है मेरे पास इसलिए किसी ओर के हिसाब से नहीं चल पाती,
मुझे गलत के लिए बोलना आता है,
इसलिए आखें बंद किए चैन से बैठ नहीं पाती।।

मेरे लिए वो हर इंसान गलत है जो गलत को बढ़ावा दे,
लेकिन मैं गलत के खिलाफ बोले बिना रह नहीं पाती,
इसलिए बहुत कम लोग है मेरी जिंदगी में जो पसंद करते है मुझे,
बाकियों के लिए तो बहुत बुरी हूं मैं क्योंकि झूठ, धोखा, दिखावा, फरेब मैं पचा नहीं पाती।।



रविवार, 2 मई 2021

चुप्पियां

किसी के तीखे शब्दों से जब दिल दुख रहा है,
तब भी हंसना न जाने, रोने से भी ज्यादा क्यों जरूरी था,
धीरे धीरे जब सब साथ छोड़ रहे है,
तब भी उस भीड़ का हिस्सा बनना ना जाने अकेले रहने से ज्यादा क्यों जरूरी था
चुप्पियां बढ़ती जा रही है,
उन सारी जगहों पर जहां बोलना जरूरी था।

अब जब ख़्वाब आ ही नहीं रहे है,
तब भी नींद की राह देखना ना जाने सूरज का इंतजार करने से ज्यादा क्यों जरूरी था,
अब जब बेचैनियां बेशुमार बढ़ती जा रही है,
तब भी सब्र करना ना जाने सुकून ढूंढने से ज्यादा क्यों जरूरी था,
चुप्पियां बढ़ती जा रही है,
उन सारी जगहों पर जहां बोलना जरूरी था।

अब वो अजीज़ ख्वाहिशें हमारी रद्दी हुए जा रही है,
तब भी उन्हें अलविदा कह देना ना जाने उनका हाथ पकड़ने से ज्यादा क्यों जरूरी था,
धीमे धीमे जिंदगी वक्त की आंच पर पकती जा रही है,
तब उसकी आंच बुझा देना ना देना ना जाने उसके पकने देने से ज्यादा क्यों जरूरी था,
चुप्पियां बढ़ती जा रही है,
उन सारी जगहों पर जहां बोलना जरूरी था।

माना रिश्तों में गांठें बढ़ती जा रही है,
तब भी उस धागे को बदल देना ना जाने पुरानी गांठे सुलझाने से ज्यादा क्यों जरूरी था,
काली घटा अब छंटती जा रही है,
तब भी खिड़कियां बंद करना ना जाने खुली हवा में सांस लेने से ज्यादा क्यों जरूरी था,
मुश्किलें रोज़ बढ़ती जा रही है,
तब भी अपने कदम पिछे हटा लेना ना जाने उनका डटकर सामना करने से ज्यादा क्यों जरूरी था
चुप्पियां बढ़ती जा रही है,
उन सारी जगहों पर जहां बोलना जरूरी था।


शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

बेनाम उर्फ अजीज़ रिश्ते

हां, सच ही तो है..."कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते, 
                        "कुछ रिश्ते सिर्फ नाम के ही                                  होते है।"
इन दो पंक्तियों में रिश्तों की पूरी व्याख्या कर दी गई है। और वाकई जिंदगी में हर पड़ाव एक सा नहीं होता और न ही स्थितियां एक सी होती है, हां लेकिन जिंदगी का हर पड़ाव हमारी ऊंगली पकड़ कर हमें किसी ऐसे रास्ते की तरफ़ मोड़ देता है, जहां से हमें सामने का रास्ता साफ देखने में आसानी हो जाती है। इन दो तरह के रिश्तों से हम बहुत कुछ सीख जाते है... गिरकर संभलना... रोक कर हंसना... हार कर जीतना...और बिखर कर सिमटना।।
ये दो तरह के रिश्ते हमें बहुत सारे अहसास एक साथ करवा देते है ...तो देखिए फिर की अक्सर क्या क्या करते है ये हमारे लिए:-
कुछ हमें देने के लिए अपना सब दांव पर लगा देते है,
कुछ हमारा भी लेने की फिराक में रहते है,
कुछ हमारी सफलता के गुब्बारे में रोज हवा भरते है,
कुछ उसी गुब्बारे में पिन चुभने की कोशिश में लगे रहते है,
जी जनाब, मेरा यकीन मानिए कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते,
और कुछ रिश्ते सिर्फ नाम के ही होते है।।
कुछ हमारे लिए चट्टान से खड़े होते है,
तो कुछ हम पर हथौड़ा चलाने के लिए तैयार रहते है,
कुछ की दुआओं में सिर्फ हमारा नाम होता है,
कुछ हमारी बर्बादी का कलमा रोज पढ़ते है,
यकीनन, कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते,
और कुछ रिश्ते सिर्फ नाम के ही होते है।।
तुम्हारे पास ज्यादा है मुझसे, ये शिकायतें वो तमाम करते है,
उनके सामने हम कुछ भी नहीं, इसका जिक्र भी वो सरेआम करते है,
गिर जाए उनके कदमों में किसी दिन, ये दुआ वो सुबह शाम करते है,
लेकिन कुछ है अपनो से भी अपने जो बिन बोले ही हमारा ख्याल रखते है,
यकीनन, कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते,
और कुछ रिश्ते सिर्फ नाम के ही होते है।।

उपर लिखी हर एक पंक्ति आपको आज के समय से रूबरू करवाएगी, पर दोस्तो जिंदगी बहुत छोटी है, मैं मानती हूं कि इसमें आपको दोनो तरह के लोग मिलेंगे और ऐसा भी हो सकता है "जो रिश्ते सिर्फ नाम के ही होते है" ऐसे लोग आपको ज्यादा मिले लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है, कि आपका "कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते" वाली कैटेगरी से भी विश्वास उठ जाए।।
बल्कि मैं तो कहूंगी की आप सिर्फ उन रिश्तों पर ध्यान दो जो आपकी सफलता के गुब्बारे में हवा भरते है... पिन चुभने वालों से आपको कुछ हासिल नहीं होगा...
रिश्तों को निभाने के भी कुछ नियम होते है..कुछ जरूरत होती है..कुछ कायदे होते है...
और यकीन मानिए अगर आपने इन सब को निभा लिया तो यकीनन आप दुनिया के सबसे खुशकिस्मत इंसान होंगे:-
1. रिश्तों में कुछ भी एकतरफा नहीं होता, दोनो तरफ़ से बराबर भावना होगी तभी अपनापन पनपेगा।
2. रिश्तों में कभी भी किसी को भी नीचा दिखाने की कोशिश मत करो। 
3. रिश्तों में कभी भी किसी की हैसियत देख कर अच्छे आचार व्यवहार की नियत मत रखो, बल्कि सभी का सम्मान करो।
4. रिश्तों में स्वार्थ भाव रखना बहुत ही गलत है।
5. रिश्तों में कभी भी गलत को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।
6. रिश्तों में एक दूसरे के मुश्किल वक्त में साथ खड़ा होना चाहिए।
7. रिश्तों में कभी भी कोई भी फ़ैसला थोपना नहीं चाहिए.. हर स्थिति के लिए एक दूसरे से सलाह कर लेनी चाहिए।
8. रिश्तों में एक दूसरे को वक्त देना भूत ज़रूरी है।
9. रिश्तों में मिठास बढ़ने के लिए अगर आपको कुछ समझौते करने भी पड़ जाए तो पीछे न हटे।
10. और याद रखिए "सॉरी" और "थैंक्यू" जैसे शब्दों का इस्तेमाल आपको रिश्तों में रंग भरने का काम बहुत आसानी से कर सकते है।
तो दोस्तों आज के लिए बस इतना ही.. फिर मिलेंगे किसी अन्य विषय के साथ .. तब तक अपना और अपनो का ख्याल रखिए, हंसते रहिए और हंसाते रहिए।।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

"वो शादी वाला बैग"

बैग... हां वही बैग जो मां ने शादी के समय ये कहते हुए मेरे ज़रूरी सामान से भर दिया था कि उस घर जाते ही तुम्हें इसकी जरूरत पड़ेगी....तेरा सारा ज़रूरी सामान इसमें रख दिया है।
उस वक्त लगा जैसे मां ने मेरी सारी दुनिया समेट कर उस बैग में रख दी हो, क्योंकि जब दूसरे घर जाऊंगी तो मां नहीं होगी वहां, यही सूटकेस होगा जो मां ने मेरी विदाई के वक्त मेरे साथ गाड़ी में रख दिया था।
बड़ा मुश्किल था उस सुहाने सपनों की दुनिया से इस हकीकत की दुनिया में आना। पर मां अक्सर कहा करती है कि "एक दिन हर लड़की को जाना होता है अपने घर" तो मैने भी हां में सिर हिला दिया। फिर तो बस समय जैसे पंख लगा कर उड़ गया था...
लेकिन जब दूसरे घर जाकर देखा तो उस सूटकेस में सिर्फ मेरी जरूरत का सामान था, मेरी जिंदगी तो वही उसी घर छूट गई थी। मैंने मां पर भरोसा कर लिया था कि उन्हें पता है कि मेरे लिए ज़रूरी क्या है, तो उन्होंने रख दिया होगा। लेकिन नहीं उसमे तो वो था ही नहीं जो मेरे लिए वाकई ज़रूरी था।
मेरी वो बचपन वाली शरारतें, वो खिलखिलाकर हंसना, वो पापा के साथ मस्ती, वो भाई बहनों को परेशान करना, वो "तोरी की सब्जी नहीं खानी" वाले नखरे, वो आलू के पराठें खाने की जिद, वो चोट लगने पर मां के सीने से चिपक जाना, वो मां के डांटने पर उनकी शिकायत पापा से करना, वो आइस क्रीम खाने की जिद , वो चांद को देखकर उसे पा लेने का जुनून, रात को मां से चिपक कर वो सुकून भरी नींद, नींद वो बुरा अपना देखने पर मां का वो पुचकार कर वापिस सुला देना, वो हर जन्मदिन पर मां का नए कपड़े लाकर देना, वो नारियल तेल की मालिश , वो बारिश में ना भीगने की हिदायत, वो सड़क पार करते हुए मां का मेरा हाथ कस के पकड़ लेना, वो दुकान पर रखा बड़ा सा टेडी बियर लेने की जिद करना.....और न जाने क्या क्या... सब तो वही छूट गया मां। वो हसीन यादें तो तुम मेरे इस सूटकेस में रखना ही भूल गई।
हालांकि इस बैग में वो सामान है ही नहीं जो मेरे लिए ज़रूरी हैं, लेकिन फिर भी ये बहुत भारी लगता है मां।
आज जब भी इसे लेकर तुमसे मिलने आती हूं ये तब भी भारी होता है...और जब तुमसे मिलकर वापिस आती हूं ये तब भी भारी होता है...इसके अंदर कुछ हो न हो मां, लेकिन तुमसे मिलकर वापिस आते वक्त जब मन भारी होता है, तो इस बैग का वजन दोगुना हो जाता है। कभी कभी ये बोझ मै उठा ही नहीं पाती।
मां मेरा सारा ज़रूरी सामान मुझे वापिस कर दो और बदले में ये बैग तुम भले ही वापिस ले लो। मेरे कंधे और दिल अभी भी बच्चों के से ही है मां, इस बैग को उठा पाना मेरी बस का हैं ही नहीं। मैं अभी भी तो तुम्हारी वही छोटी बच्ची हूं जिसके जिद करने पर भी दुकान से लाया भारी सामान तुम उठाने नहीं देती थी...
तो आज क्या हो गया... क्यों मुझे बड़ा बना देने की जिद करने लगी हो तुम ....
देखो मां मैं कह देती हूं...तुम मुझसे मेरा ज़रूरी सामान नहीं छिन सकती...
मेरा ज़रूरी सामान मेरे मां पापा है...और वो उस घर है.. हां मैं उन्हे सूटकेस में तो नहीं ला सकती.. लेकिन तुम्हे बताए बिना मै चुपके से इन्हें दिल में रख लाई हूं... माफ करना मां.. लेकिन यही मेरा ज़रूरी सामान है...



बुधवार, 21 अप्रैल 2021

कुछ अपनो के लिए

हैलो दोस्तों ...कैसे है आप....आशा करती हूं की आप सब लोग अपना और अपनो का ख्याल रख रहे होगें।।
जैसा कि हम सभी जानते है की पूरे देश में कोरोना काल चल रहा है, अस्पतालों में मरीजों के लिए बेड नहीं है, शमशानो में लाशों की लंबी लाइन है, लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पा रहे है।। जिस हवा में इंसान खुल कर सांस लेने की सोचता था ..आज वही हवा उसकी मौत का कारण बन गई है। आक्सीजन की कमी लोगो को मजबुर कर रही है की वो मछली की तरह तड़पते रहे।
लेकिन जरा दो मिनट के लिए सोचिए क्या इन सब परिस्थितियों का ज़िम्मेदार हमारे अलावा कोई और है?
नहीं जो भी स्थिति आज देश में व्याप्त है , आज जिस महामारी से देश जूझ रहा है उसके ज़िम्मेदार हम खुद है।। सोच कर देखिए क्या हम लोगो ने कभी अस्पताल की सुविधाओं की तरफ गौर किया, हमें तो जैसे अस्पतालों की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई, हम तो सिर्फ धर्म के नाम पर एक दूसरे के दुश्मन बने बैठे है, कोई मंदिर के लिए लड़ रहा है तो कोई मस्जिद के लिए । इंसानियत के लिए तो हम कभी लड़े ही नहीं...तो देखिए फिर परिणाम हमारे सामने ही है, जिसने हम सब को घरों में कैद होने पर मजबूर कर दिया है।लेकिन अभी भी वक्त है ... गलतियों को सुधारने का ....अपने अपनो के लिए अपनी गलतियां सुधारनी चाहिए हमें...ताकि हमारी गलतियों का प्रभाव उन पर न पड़े।
तो चलिए फिर, सबसे पहले हम ये जान ले की इस महामारी के बीच भी हम खुद को और अपने अपनो को स्वस्थ कैसे रख सकते हैं:-
1. सकारात्मक रहिए: इन भयानक परिस्थितियों का सामना करने का सबसे प्रभावशाली तरीका है की खुद को साकारात्मक रखिए। जब हम सकारात्मक सोचते है तो हमें सब अच्छा महसूस होता है....और हम बेहतर महसूस करते है...

2. परिस्थितियों को हावी न होने दे:- ये हम सभी जानते है की महामारी से पूरा देश जूझ रहा है....देश का हर तबका इसका प्रभाव झेल रहा है.. लेकिन हालात कैसे भी हो.. एक जैसा नहीं रहता.. इसलिए अपने आप को ज्यादा परेशान न करे, जितना ज्यादा हो से कोशिश कर शांत चित्त रहे ।

3. साफ सफाई का ख्याल रखे: इस महामारी में हमें हमारे घर की साफ सफाई के साथ साथ हमारे शरीर की साफ सफाई पर भी ध्यान देना होगा। जिससे हमारा किसी भी तरह  संक्रमण से बचाव सुनिश्चित हो सके।

4. रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन: हमें अपने रोजाना के आहार में ऐसे खाद्य पदार्थों की मात्रा बढ़ानी चाहिए जो हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक हो। विटामिन सी इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हो सकता है। 

5. बाज़ार का खाना तथा डिब्बा बंद चीज़ों का त्याग करे: हमें हमारे स्वास्थ्य को मध्य नज़र रखते हुए बाजार का खाना तथा डिब्बा बंद चीज़ों का सेवन नहीं करना चाहिए । इसे हमारे बीमार होने के चांस 46 प्रतिशत बढ़ जाते है।

6. तले हुए भोज्य पदार्थों का सेवन न करे: तले हुए भोज्य पदार्थों को बाहर कर अपनी दिनचर्या में फाइबरयुक्त भोज्य पदार्थों को शामिल करे। इसमें आप सलाद, सप्राउट्स, तथा हरी सब्जियां शामिल कर सकती है।

7. योग करे: जी हां, वो कहा गया है ना " की तन चंगा ते मन चंगा" तो इस जुमले को अपनाए तथा योग करे। ये न सिर्फ आपके तन को स्वस्थ्य बनाएगा बल्कि आप अंदर से भी बेहतर महसूस करेंगे।

8. सेनिटाइजेशन जरूरी: बाहर किसी भी वस्तु को छूने के बाद आपने हाथों को अच्छे से सेनिटाइज करे.. तथा ध्यान रखे की इस परिस्थितियों में आप अपने हाथों को आखों से, मुंह से दूर रखे।

9. सब्जी तथा फलों को भी धोकर कर इस्तेमाल करें: हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए की हम बाहर से लाई गई किसी भी वस्तु को धोकर या सेनिटाइज करके ही इस्तेमाल करे। तथा फलों और सब्जियों का विशेष ध्यान रखें।

10. अपनो के साथ वक्त बिताए: जी हां, आज जिस महामारी ने अपनो को अपनो से दूर कर दिया है... ऐसे में हमे चाहिए की हम ज्यादा से ज्यादा अपनो के साथ वक्त बिताए। यह हमें इस रोग से लड़ने की शक्ति देगा । हमें अंदर से भी तथा बाहर से भी मजबूती प्रदान करेगा।

तो दोस्तों आज के लिए इतना ही फिर मिलेंगे किसी ऐसे ही आपसे जुड़े विषय के साथ...तब तक आप लोग अपने घरों में रहे, सुरक्षित रहे। अपना और अपनो का ख्याल रखिए।।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

दुर्गा मां की सीख

 हर घर से वो मोहक सी कपूर की खुशबू आना..वो छोटे छोटे पैरों में पायल पहने लक्ष्मी सा घर में प्रवेश करना...वो छोटे छोटे हाटों से हलवा पूरी का भोग लगाना...आया कुछ समझ..?

जी हां हम बात कर रहे है नवरात्रि के पावन नौ दिनों की, कन्या पूजन की तथा वो दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों से उनकी कहानियों से सीखने को मिलता है.. उस अमृत की...

यूं तो दुर्गा मां वर्ष भर ही पूजनीय है.. लेकिन नवरात्रि के दौरान देवी पूजन तथा कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। माता के भक्तों के लिए ये नौ दिन कुछ अलग ही सुकून देने वाले होते है, भक्तों द्वारा पूरे नौ दिनों तक मां की पूजा अर्चना की जाती है। हमारे ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, महेश द्वारा मां दुर्गा की उत्पत्ति हुई। अष्टभुजाओं में शस्त्र लिए तथा चेहरे पर मुस्कान लिए मां सिंह की सवारी करती है। कई राक्षसो का वध करने वाली मां दुर्गा ने मुश्किल समय में भी देवताओं की मदद कर अपने आपको आदिशक्ति साबित किया है।।

तो चलिए फिर हम भी इन नवरात्रि में जाने की आदिशक्ति के नौ रूपों से हमें क्या शिक्षा मिलती है:-

1. मुस्कान से मुश्किल हल:- जब भी हम मां देखते है तो सबसे पहले हमें आकर्षित करती है उनकी मोहक मुस्कान । जी हां उनकी मुस्कान हमें बताती है की जीवन में कितनी भी मुश्किलें हो लेकिन हमें मुस्कान का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। बल्कि प्यारी सी मुस्कान के साथ हमें मुकाबला करना चाहिए।

2. हर किरदार को महत्व देना:- हम सब अपने जीवन में बहुत सारे किरदार निभाते है.. कभी दादा दादी, नाना नानी, पति पत्नी, भाई बहन, मम्मी पापा, दोस्त। मां के नौ रूप हमें सिखाते है की समय आने पर हमें अपने हर किरदार को साबित करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

3. लक्ष्य के प्रति समर्पण:- मां द्वारा महिषासुर का वध तथा अन्य राक्षसों का संहार करना हमें सिखाता है को जीवन में लक्ष्यों का निर्धारण कितना महत्वपूर्ण है। लक्ष्य निर्धारित करने से आपको अपने किए गए कार्यों का विश्लेषण करना आसान हो जाता है।

4. निर्भयता: मां सिंह पर सवार होकर हमें यह सीख देती है की अगर हम सही कार्य कर रहे हैं तथा हमारा मकसद सेवाभाव का है तो हमें किसी से भी बिना डरे अपना कार्य करते रहना चाहिए। जीवन के रास्तों को हमें निर्भयता से पर करना चाहिए।

5. हर पल सीखने की कोशिश: मां दुर्गा के उत्त्पति तथा उनका आपने कार्य करना...देवताओं की मदद के लिए hr समय खड़े रहना.. तथा उनके ब्रह्मा, विष्णु, महेश द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करना तथा हर पल उनसे सीखते रहना हमें सिखाता है की हमें अपने जीवन में हर पल सीखने की कोशिश करनी चाहिए। वो कहा है ना किसी ने की सीखने की कोई उम्र नहीं होती।।

तो दोस्तों आज के लिए सिर्फ इतना ही..फिर मिलते है किसी नए विषय के साथ.. तब तक आप ख्याल रखिए अपना और अपनो का...

जय माता दी।।


शनिवार, 10 अप्रैल 2021

रिश्ता बेटी और मां का..

 हैलो दोस्तों, कैसे है आप...आशा करती हूं की इस कोरोना काल में आप अपना और अपनो का ख्याल रख रहे होगें।।

दोस्तों जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर हमें ये अहसास हो ही जाता है की हमारे अपने, हमारे लिए कितनी जरूरी होते है...उनके बिना हमारा अस्तित्व ही नहीं होता।।
और हमें हमारी पहचान करने वाली होती है हमारी मां....
वो कहते हैं ना की मां हर रिश्ता निभा सकती है..लेकिन मां वाला प्यारा रिश्ता कोई नहीं निभा सकता। उनकी जगह कोई ले ही नहीं सकता।।
तो आज मैं आप लोगो के लिए लाई हूं एक बेटी के कुछ एहसास जिसकी शादी हो गई है, और उसका घर भी बदल गया है...लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वो है उसका उसकी मां से रिश्ता...उनके बीच के अनकहे अल्फाज़...उनके बीच की वो गरमाइश जो कभी ठंडी नहीं पड़ सकती।।
तो आइए जुड़ जाए उन प्यारे एहसासों के साथ....

"वैसे तो हवा रोज ही चलती है लेकिन आज वो मेरी मां के घर की और से आ रही थी। महकती हुई सी वो बार बार मेरे बालों को ठीक वैसे ही सहला रही थी जैसे मां अपने हाथों से सहलाया करती थी। हर झोंके में उनका स्पर्श मुझे महसूस हो रहा था। कभी बहुत ज़ोर से और कभी धीरे से चल रही थी ठीक वैसे जैसे मां कभी गुस्से से और कभी प्यार से मुझे समझाती थी। हर एक झोंका खाली न आते हुए वो कढ़ाई में बनते पकौड़ों की खुशबू अपने साथ ला रहा था। बहुत सारी यादें लिए हर झोंके मुझे अपनी और खींच रहा था। इस हवा से बहुत पुराना सा रिश्ता है हमारा, शायद तब से जब मां मुझे सीने से लगाए लोरी सुनाकर सुलाया करती थी। वो धीरे धीरे मुझे थपथपाते हुए इस हवा के साथ साथ टहल रही होती है। और मैं भी सपनों की दुनिया में झांकते हुए नींद के आगोश में चली जाती थी। वो बचपन वाली नींद बहुत प्यारी और बेपरवाह होती थी और जब मां के सीने से चिपके होते थे तो लगता था मानो सारी दुनिया अपनी ही है। लेकिन जैसे जैसे बड़े होते गए समझ आने लगा की सारी दुनिया नही सिर्फ़ मां अपनी है। बहुत अच्छा लग रहा था सब कुछ बिल्कुल वैसा जैसा मां की गोदी में लगता था। लेकिन अचानक से ऐसा लगा जैसे मां की गोदी से किसी ने झटके से नीचे उतार दिया हो। ऐसा लगा जैसे किसी ने उस बेपरवाह सी नींद में आए हुए सपने को तोड़ दिया हो।इस बार झोंके ने जब आकर छुआ तो उसमे कुछ नमी सी थी, थोड़ा भीगा हुआ सा था वो। फिर मुझे भी एक पल नहीं लगा ये समझने में की इस हवा के झोंके ने मेरी मां को मेरी भी तो याद दिला दी होगी ना। जब उसे छुआ होगा तो उसे भी तो लगा होगा जैसें मैं बचपन की तरह दौड़ कर उसे लिपट गई हूं , मेरी शरारतें, मेरी अटखेलियां, वो सारी बातें, वो सारे पल याद आ गए होंगे जो हमने साथ बिताए है। आज मां से थोड़ी दूर हूं लेकिन हर पल, हर लम्हा उन्हें उन्हीं की तरह याद करती हूं।।
बस आज थोड़ा ज्यादा कर रही हूं, इन शादी की रस्मों ने मुझे उनसे दूर कर दिया हो, लेकिन वो हमारे रिश्ते में दूरियां कभी नहीं ला सकती। हम एक दूसरे से उन्हीं करीब रहेंगे। ऐसे ही एक दूसरे को महसूस भी करते रहेंगे, कभी हवा से, कभी बारिश से और कभी जून की तेज तपिश से, और कभी एक दूसरे को कस के गले लगा के।।
वो कहते है ना....
 " मां है तो जन्नत है अपने पास,
और मां नहीं तो जन्नत भी बेकार है अपने पास।।"

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

सेंधा नमक

नमस्कार दोस्तों, कैसे है आप...
दोस्तों मैं कोशिश करती हूं की हमेशा आपके लिए कुछ जिंदगी से जुड़ा हुआ लाऊं...
लेकिन आजकल के भागमभाग ने इंसान को बहुत सारी बीमारियों का शिकार बना दिया है...जिसकी वजह से वो हर समय तनाव महसूस करने लगा है..
तो चलिए आज स्वास्थ्य से जुड़ी बातें कर लेते है...
बस थोड़ा सा नमक , थोड़े बदलते रिश्ते
काफी है मेरे घाव को गहरा करने के लिए ।।
पहले जो मक्खन लगाते है,
फिर वही नमक  छिड़कते है।।
जी हां इस तरह के जुमले बहुत सुने होंगे आपने और इनसे आप समझ गए होगे की "नमक" हम सब की जिंदगी में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।। वो नमक ही है जो हमें ये अहसास करवाता है की जिंदगी में हर चीज के लिए संतुलन कितना ज़रूरी है, जब कभी सब्जी में नमक तेज हो जाए तो हमारी जीभ साफ साफ इंकार कर देती है उसे स्वीकारने से, और जो कभी वो कम हो जाए तो खाना एक दम बेस्वाद हो जाता है फिर हमारा नटखट मन उसे खाने से मना कर देता है।।
दोस्तों, वैसे तो हम सब ही रोज नमक का अपने घरों में इस्तेमाल करते है..लेकिन हम में से बहुत सारे लोग " सामान्य नमक" की जगह " सेंधा नमक" का प्रयोग करते है जो न सिर्फ स्वाद में बेहतर होता है बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत लाभदायक होता है। हालांकि सेंधा नमक भी नमक की ही एक किस्म है लेकिन इसके उपयोग के अनेक फायदे है :
तो आइए जानते है " सेंधा नमक" के बारे में और इसके फायदों के बारे में...
सेंधा नमक एक प्राकृतिक नमक है यह खारे तालाबों से निकाला जाता है, हालांकि यह उस समय ठोस पत्थर जैसे आकर में होता है। इसे तोड़ कर छोटा किया जाता है था फिर इसको पाउडर में परिवर्तित किया जाता है। यह हल्का लाल या हल्के काले रंग का हो सकता है तथा इसका जो रंग है वह इसमें मौजूद ऑक्साइड की वजह से होता है ।।
सेंधा नमक के फायदे :-
1. ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए रामबाण: यह बी.पी के मरीजों के लिए बहुत
लाभदायक है , क्योंकि यह खून के बहाव पर नियंत्रण रखता है.. तथा उसकी गति को उच्च या निम्न होने से बचाता है।।
2. तनाव कम करने में लाभ दायक: आज कल की भाग दौड़ वाली जिंदगी में हर तीसरा इंसान तनाव से जूझ रहा है, ऐसे में ये नमक उनको तनाव से राहत दिलाने वाला साबित हो सकता है।
3. जोड़ो के दर्द में राहत दिलाता है: आजकल जोड़ो के दर्द की समस्या आम हो गई है...इसकी वजह से लोगो को असहनीय दर्द झेलना पड़ता है और कभी कभी ये बहुत घातक हो सकता है...इसलिए जोड़ो के दर्द में राहत के लिए कई बार सेंधा नमक खाने की सलाह दी जाती है।
4.शरीर को ठंडा रखता है: सेंधा नमक की तासीर ठंडी होती है..जिसकी वजह से यह हमारे शरीर का तापमान संतुलित करके हमारे शरीर को ठंडा रखता है।।
5. वजन घटाने मे सहायक: जी हां,सेंधा नमक हमारे शरीर की बढ़ी हुई चर्बी को कम करने में हमें भरपूर सहयोग दे सकता है अगर हम नियमित इसका प्रयोग करे।
6. वस्तु दोष दूर करे: सेंधा नमक हमारे घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।
इसे पोछा लगात समय पानी में दो चुटकी मिलाए तथा उससे पोछा लगाए...यह घर के वस्तु दोष भी दूर करता है।
7. नींद के चक्र को नियमित करता है: सेंधा नमक हमारे निंद्रा चक्र को भी नियमित करता है, जिससे हमारा शरीर चुस्त बना रहता है तथा हम ऊर्जावान महसूस करते है।।
तो ये थे दोस्तो, सेंधा नमक के फायदे ...आशा करती हूं आपको ये लेख पसंद आया होगा।
तो अगले लेख में फिर मिलेंगे किसी और विषय के साथ... तब तक आप सब से इजाज़त लेती हूं।।
अपना ख्याल रखिएगा...खुदा हाफ़िज़

शनिवार, 13 मार्च 2021

मुस्कुराहटें

हैलो फ्रेंड्स....शुभ संध्या...
आज कुछ ऐसे लोगो के बारे में पढ़ा.... जिन्होंने अपने रिश्तों को बचाने के लिए क्या क्या नहीं किया....
हम सब जानते है की हम सब भी बिल्कुल उस बीज की तरह होते है.. जिसे पनपने के लिए धूप, पानी, और मिट्टी की जरूरत होती है..ठीक इसी तरह हमें भी जीने के लिए रोटी, कपड़ा, और मकान के अलावा प्यार, देखभाल और कुछ रिश्ते चाहिए होते है..जो हमारी जिंदगी का आधार होते है।।
लेकिन जरूरी नही है की हर किसी को हर चीज मिले...कई बार ये सारी चीज़ें हमें खुशियां देने की बजाय दर्द दे रही होती है...और हम फिर भी कोशिश करते है की सब ठीक हो जाए..बिल्कुल वैसा जैसा हम चाहते है...फिर सिलसिला शुरू होता है बाहर दिखावटी मुस्कुराहटों का..और अंदर ही अंदर घुटने का...लेकिन इन सब से कुछ नहीं होने वाला..बल्कि हम अपना ही नुकसान कर रहे होते है...तो आज कुछ है मेरे पास उन लोगो के लिए जो दूसरों के लिए खुद को भूल जाते है..तो चलिए डालते है एक नज़र..
कुछ भी हो जाए अगर तो हम सोच लेते है की ये किस्मत का लेखा है,
पर रिश्ता बचा लेने की जिद में, मैंने अक्सर मुस्कुराहटों को घुटते देखा है।।
आज में जीना चाहते है सब, क्योंकि हममें से कल किसने देखा है,
फिर अनायास ही उस पर चली जाती है नज़र, हाथों में हमारी लंबी जिंदगी की जो रेखा है।।
आज कल हर चीज का सौदा करते है लोग, अरे आजकल तो प्यार का दूसरा नाम ही धोखा है,
सारी दुनियां की खुशियां कदमों में रख देने की आड़ में, मैंने अक्सर चूड़ियों को टूटते देखा है।।
तुम जिसे चाहो, वो किसी और को चाहे, आजकल ये सिलसिला सरेआम होते देखा है,
प्यार में चांद तारे तोड़कर लाने के वादे के बाद भी, मैने अक्सर लोगो को टूटते देखा है।।
दिल खरीदना है अगर किसका तो थम जाइए जनाब, मैने आजकल रोज MRP को बदलते देखा है,
यकीन मानिए अभी और भी सस्ते होंगे दिल, क्योंकि लोगो ने इसे आजकल रद्दी के भाव कर रखा है।।
संभल जाइए जनाब अभी भी मौका है, लोगो की जिंदगियों को मैने विज्ञापन बनते देखा है,
जिन चीज़ों को आप ठंडा समझकर खाते है, मैंने अक्सर उनकी तासीर को गर्म होते देखा है।।
कुछ अपने लिए जिया करो जनाब, दूसरों के लिए जीने वालों को मैंने अक्सर उदास देखा है,
कुछ अपनी कह दिया करो, कुछ उनकी सुन लिया करो
क्योंकि खामोशियों को अक्सर मैंने बंद कमरे में पंखों से लटकते देखा है।।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

बही खाते

हैलो फ्रेंड्स... आज चंद पंक्तियां उन लोगो के लिए जो बेचारे अपनी ज़िन्दगी के सारे काम धंधे छोड़कर हमारी ज़िन्दगी में सीसीटीवी कैमरे लगवा लेते है।।पता नहीं उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि उन्हें पूरा हक़ है हमारी ज़िन्दगी के हर पन्ने को पढ़ने का ... उनमें कमियां निकालने का ...और उसके बाद हर पन्ने पर अपने नाम कि stamp लगाने का...
ऐसे लोगो से मेरा अनुरोध है कि कृपया अपने काम पर ध्यान दे ..ताकि भगवान को ये ना लगे कि आपको पैदा करके उनसे कोई गलती हो गई...
तो चलिए फिर ग़ौर फरमाए :-
लहज़े में बदजुबानी, चेहरे पर नक़ाब लिए फिरते हैं,
जिनके खुद के बहीखाते बिगड़े है, वो मेरा हिसाब लिए फिरते है।
कहते सुना है उन्हे अक्सर की बहुत बुरे है हम, और खुद के अच्छे होने का वो जैसे अवॉर्ड लिए फिरते है,
देखा है जनाब मैने उनकी अच्छाईयों को भी ग़ौर से,
अपना काम निकलवाने के लिए कैसे वो अक्सर लोगो के तलवे चाटते फिरते है,
जिनके खुद के बही खाते बिगड़े हैं, वो मेरा हिसाब लिए फिरते है।।
हां झुकती नहीं बेवजह किसी के आगे, मगर मुझे झुकाने का वो दिल में अपने अरमान जगा कर बैठे है,
मुझे गिराकर आगे कैसे निकला जाए, नासमझ है कितने जो इसलिए लिए तरकीब ढूंढते फिरते है,
जिनके खुद के बही खाते बिगड़े हैं, वो मेरा हिसाब लिए फिरते है।।
मेरी मासूमियत को वो मेरी बेवकूफी समझ कर बैठे है, कब टूट कर बिखर जाऊ , ये घात लगाए बैठे है,
बेचैनियों के इस दौर में उलझे हुए है नासमझ,
और छीन लेने को मेरा सुकून वो तैयार हुए फिरते है,
जिनके खुद के बही खाते बिगड़े हैं, वो मेरा हिसाब लिए फिरते है।।
मेरी ज़िन्दगी के हर पन्ने को वो बड़े शौक से पलटते है, फिर अपने बाप कि जंगीर समझ के आगे की किताब खुद लिखने लगते है,
शब्दों के जाल में फंसे पड़े है नासमझ और लिखने को मेरी कहानी वो कलम लिए फिरते है,
जिनके खुद के बही खाते बिगड़े हैं, वो मेरा हिसाब लिए फिरते है।।
बड़ी शख्सियत तो नहीं, लेकिन मैं उनमें से हूं जिनको रास्ता दिखाने को भोलेनाथ ऊंगली पकड़ लेते है,
कह दो उन समझदार लोगों से कि मैं मोम की गुड़िया नहीं जिसे मिटाने को वो अंगार लिए फिरते है,
कमाल है वैसे, जिनके खुद के बहीखाते बिगड़े है, वो मेरा हिसाब लिए फिरते है।।
 




सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

थोड़ी सी बच गई हूं

हैलो फ्रेंड्स ... आज कुछ लाइन ...उन पलों को उन लम्हों को बताने के लिए ...जब हम कहीं अकेले तन्हा बैठे हो...और क्या खोया ? क्या पाया ? की कशमकश में उलझे हो।।
जब कभी अचानक से ख्याल आए की ऐसा क्या पाना है हमें जिसकी वजह से हम हर जाते हुए लम्हे के साथ अपने आप को थोड़ा थोड़ा खोते जा रहे है...
एक अंधी सी दौड़ में भागते जा रहे है....लेकिन भाग तो रहे है पर मंज़िल कहां है और कौन सी है ये किसी को नहीं पता...तो चलिए फिर थोड़ा ग़ौर फरमाए:-




कुछ टूट सी रही हूं इन दिनों, किसी झूठे वादे की तरह,
कुछ धुंधली सी भी पड़ गई हूं मैं, कुछ पुरानी यादों की तरह,
और अब तो मैं वैसे भी थोड़ी सी ही बची हूं, 
फ़रवरी की इन सुहानी सर्दियों की तरह।।

कुछ खोई सी हूं आज कल मैं, बिल्कुल अमावस्या के उस चांद की तरह,
कुछ उलझ सी गई हूं मैं, पुराने धागों की रील की तरह,
कुछ घबराई हुई सी हूं इन दिनों, बिल्कुल एक अकेले छोटे बच्चे की तरह,
और अब तो मैं वैसे भी थोड़ी सी ही बची हूं,
फ़रवरी की इन सुहानी सर्दियों की तरह।।

कुछ शांत सी हूं इन दिनों, किसी तालाब में ठहरे पानी की तरह,
कुछ उदास सी हूं इन दिनों, बड़ी मुश्किल से सांस लेते आजकल वाले रिश्तों की तरह,
और अब तो मैं वैसे भी थोड़ी सी ही बची हूं, 
फ़रवरी की इन सुहानी सर्दियों की तरह।।
कुछ बिखर सी गई हूं आज कल, खुले हुए चीनी के डिब्बे कि तरह,
थोड़ी थोड़ी धीरे धीरे खत्म हो रही हूं इन दिनों,
किसी धारावाहिक के आखिरी एपिसोड कि तरह,
और अब तो मैं वैसे भी थोड़ी सी ही बची हूं, फ़रवरी की इन सुहानी सर्दियों की तरह।।





बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

"मां मैं फिर"

 "मां" .... शब्द ही ऐसा है जिसको सुनकर ही बिल्कुल ऐसा महसूस होता है....जैसे जून कि तपती गरमी में नीम की ठंडी छांव मिल गई हो..
सच में मां वो महान शख्सियत है  जिसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता...
बहुत छोटी थी उस समय....लेकिन याद है सब कुछ..
बोलना नहीं आता था ठीक से ...किसी को समझा भी नहीं पाती थी कि क्या कहना है...लेकिन एक मां ही थी जो उस तुतलाहट को भी बहुत अच्छे से समझती थी।।
कई बार खाना खाते हुए अपने कपड़ों के साथ साथ उनके भी कपड़े गंदे कर देती थी...लेकिन कभी इस बात कि शिकायत नहीं की उन्होंने।।
जब भी चोट लगती थी सबसे पहले "मां" निकलता था मुंह से, वैसे ही आज भी जब भी कोई चोट लगती है चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक तो भी सबसे पहले "मां" ही निकलता है मुंह से।। 
मां के लिए कहना शुरू किया तो पता नहीं m कहां तक चली जाऊंगी...
लेकिन थोड़े शब्दों में कुछ कहूंगी ज़रूर...




माँ मैं फिर

माँ मैं फिर उन्हीं दिनों को जीना चाहती हूँ, फिर से तुम्हारी प्यारी बच्ची बनकर,
माँ मैं फिर तुम्हारी गोदी में सोना चाहती हूँ, तुम्हारी लोरी सुनकर, 

माँ मैं फिर दुनिया की असलियत का सामना करना चाहती हूँ, तुम्हारे उसी साथ को पाकर,
माँ मैं फिर अपनी सारी चिंताएँ भूल जाना चाहती हूँ, तुम्हारी गोद में सिर रखकर, 

माँ मैं फिर अपनी भूख मिटाना चाहती हूँ, तुम्हारे हाथों की बनी वो दुनिया की सबसे अच्छी रोटी खाकर,
माँ मैं फिर चलना चाहती हूँ, तुम्हारी ऊँगली का सहारा लेकर, 

माँ मैं फिर जगना चाहती हूँ, तुम्हारे हाथों का वो स्पर्श अपने माथे पर लेकर,
माँ मैं फिर निर्भीक होना चाहती हूँ, तुमसे सीख लेकर,

माँ मैं फिर सुखी होना चाहती हूँ, तुम्हारी दुआएँ पाकर
माँ मैं फिर अपनी गलतियाँ सुधारना चाहती हूँ, तुम्हारी डांट खाकर,

माँ मैं फिर संवरना चाहती हूँ, तुम्हारा स्नेह पाकर
क्योंकि माँ मैंने तुम्हारे बिना खुद को अधूरा पाया है. मैंने तुम्हारी कमी महसूस की है!

आज भी कई बार डर जाती हूं तुम्हें अपने पास ना पाकर🤗🤗🤗🤗 ।।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

पुराने पेपर

 हैलो फ्रेंड्स....शुभ संध्या...
किसी ने कहा... कि कुछ दिन कहीं भर घूम आओ..
मनाली...शिमला...जयपुर.... उदयपुर...और ना जाने कहां कहां...
बहुत बहलाया इस दिल को भी ... कि मान जाए...तरह तरह के प्रलोभन दिए...लेकिन सब सुनकर घूम फिरकर वापिस वहीं पहुंच जाता है...वहीं.... वहीं जहां ज़िन्दगी को जीने के लिए सिर्फ थोड़ा सा प्यार..थोड़ी सी परवाह...कुछ यादगार लम्हें और बहुत सारा अपनापन चाहिए होता है।।
वो शिमला की ठिठुरती वादियों में नहीं जाना चाहता...
उसे तो किसी ढलती शाम में किसी शांत जगह पर बैठकर उस डूबते हुए सूरज को देखना है...जो जाते जाते भी अनजाने में ये सीखा जाता है कि ...वो डूब रहा है ये ज़रूरी नहीं है...बल्कि कल वो फिर से बहुत सारी उम्मीदों ...और सपनों के साथ लौट आएगा ये ज़्यादा ज़रूरी है।।
इसी तरह हमारी ज़िन्दगी में भी बहुत सारे पल आते है जब हम डूब रहे होते है...लेकिन तब भी हमें ये याद रखना चाहिए कि कल हमें फिर से आना है चमकना है और छा जाना है।।
तो आए फिर और थोड़ा ग़ौर फरमाए:-
जो मैने किया ही नहीं,
फिर भी ना जाने क्यों उसका मलाल है,
अब तो पुराने पेपर भी जमा कर दिए मैने ऐ ज़िन्दगी,
और तुम्हें आज भी इतने सवाल है।।
उन लम्हों को मैने मुश्किल से काटा,
फिर क्यों उनको जी भर के जी लेने का मुझपर इल्जाम है,
उसके पास मुझसे ज्यादा क्यों है जनाब,
अफसोस, आज कल यही मसला सरे आम है।।
जो शिकायतें की नहीं उनसे, 
समझ लो उन पर सारी की सारी उधार है,
यूं जो खामोशियों का हाथ थाम लिया है,
तो फिर हैरानी क्यों जनाब, ये तो तुम्हारे चंद मुझपर किए गए अहसान है।।
उनकी खताओं का हिसाब हवा हो जाए,
फिर क्यों मेरी गलतियों पर बवाल है,
जल जल कर धुंआ है गई मोमबत्ती सी ये ज़िन्दगी,
यकीनन ये कुछ सुहावने झोंकों पर ऐतबार करने का परिणाम है।।
खुद को जो खूब झूठे दिलासे दिए,
फिर क्यों आज दिखावे से इंकार है,
सहमी हुई सी बेचारी मेरी ख्वाहिशें बैठी है आज एक कोने में,
पुचकार के कोई गले लगा ले, अब बस जेहन में यही अरमान है।।
अब तो पुराने पेपर भी जमा कर दिए मैने ऐ ज़िन्दगी,
और तुम्हें आज भी इतने सवाल है।।


मंगलवार, 26 जनवरी 2021

रिश्ते

हैलो फ्रेंड्स... गुड मॉ्निंग..
कैसे हो आप सब...आशा करती हूं कि इस magical सी ठंड में .. इतराती हुई...गुनगुनी धूप को एन्जॉय कर रहे होंगे...
सच कहूं जब जब ये गुनगुनी धूप आंगन में आकर विराजमान होती है तो वो बचपन वाली सर्दियों कि याद आ जाती है...
याद आता है कि कैसे मम्मी..चाची...और आंटी ऊपर छत पर बैठकर धूप सेकती थी और  हमारे लिए वो रंग-बिरंगी स्वेटर बुनती थी..कैसे नए नए डिजाइन ढूंढकर बहुत शिद्दत के साथ उस स्वेटर को पूरा करती थी..उसी दौरान आपस में बातचीत से वो कुछ घरेलू दिक्कतों को भी निपटारा बहुत सलीके से कर देती थी...एक दूसरे को सलाह भी देती थी...और साथ ही साथ कुछ घरेलू नुस्खे भी दे दिया करती थी।।
सच में कितना अपनापन लेकर आती थी वो बचपन वाली धूप...उस टाइम  सूरज के साथ साथ रिश्तों की गर्माहट को भी महसूस किया जा सकता था...लेकिन अफसोस की आज के टाइम में सबसे बड़ी चुनौती है रिश्तों को संभाल कर रखना... आज कल लोगो के पास टाइम ही नहीं की वो किसी का हाल चाल ही पूछ ले...
इसलिए आज इन्हीं खोए हुए रिश्तों के बारे में कुछ कहना है आपसे....तो चलिए ज़रा ग़ौर फरमाए:-
सख्त हाथों से भी छूट जाते है हाथ, रिश्ते ज़ोर से नहीं तमीज से थामे जाते है,
फल और फूल के आने से पहले, ये भी ठीक पौधों-से सींचे जाते है।।
कई बार ख़तरनाक मोड़ आते है रिश्तों मे भी, पर यूं बीच सफ़र में हाथ कहां छोड़े जाते है,
इस सफ़र को हर पल खुशनुमा बनाने के लिए, कई बार बिना ग़लती के भी हाथ जोड़े जाते है।।
छूट जाते है कुछ साथ इस सफर में, और कुछ इन्हें बड़ी शिद्दत से निभाते है,
बहुत नाज़ुक है इसलिए ही तो, ये भी फूलों से संभाले जाते है।। 

कुछ नए भी जुड़ जाते है इन रिश्तों की कड़ी में, जो पहले वालो से भी ज्यादा अजीज हो जाते है,
कभी जब अमावस्या-से काले साह अंधेरों में घिरे हो हम तो, यही कुछ रिश्ते हमारे लिए रोशनदान से छनकर आता हुआ उजाला बन जाते है।।

तो जनाब, ज़िन्दगी में जब सब कुछ लगा हो दांव पर , तो याद रखना की सबसे पहले रिश्ते बचाए जाते है,
इसलिए कहा गया है कि सख्त हाथों से भी छूट जाते है हाथ, रिश्ते ज़ोर से नहीं तमीज से थामे जाते है।।





 
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मंगलवार, 5 जनवरी 2021

तलाश

 हैलो फ्रेंड्स...कैसे है आप सब।।
आशा करती हूं आप सब अच्छे है और नए साल में नए plans बना रहे होंगे।।
Happy New year to you all.

दरअसल plans तो मैनें भी बनाए पिछले साल खूब...
बहुत सारी ख्वाहिशें भी रखी दिल में..
सपने भी देखे बहुत सारे....
लेकिन फिर महसूस किया ..
कि ज़िन्दगी में कुछ तलाश ऐसी भी होती हैं जो कभी ख़तम नहीं होती... जितना हम अंदर जाने की कोशिश करते है.. उतना फंसते जाते है।।
यकीन मानिए ये बिल्कुल वैसा ही है जैसा किसी दलदल में फंसने जैसा।।
पर आप लोगो कि तरह मैने भी पिछले साल से बहुत कुछ सीखा है...अब खुद की तलाश में हूं ...आगे बढ़ना चाहती हूं उन ख्वाहिशों को पीछे छोड़कर जिनकी बातों में आकर मैने हासिल तो कुछ नहीं किया लेकिन खुद को सताया बहुत है।।


नहीं नहीं... आप गलत समझ रहे है.. मैं सपने देखने या ख्वाहिशों के खिलाफ नहीं हूं...बस आपको आगाह करना चाहती हूं कि इन के साथ आपको आंखें बन्द करके नहीं चलना बल्कि पूरे होश में चलना होगा ताकि ये आपके उपर हावी ना हो पाए।।
और वैसे भी आप लोगो ने सुना होगा कि अगर मन चाहा मिल जाए तो अच्छा..और अगर ना मिले तो और भी अच्छा...क्योंकि उसके पीछे भी कुछ अच्छा ही छिपा होता है।।
तो चलिए मेरे साथ आज उन ख्वाहिशों को अलविदा कह ही दे जो हम पर हावी हो कर हमसे वो सब करवा लेती है..जो करने की हिम्मत जुटाने में हमें काफी समय लग जाता है..

तंग आ चुकी हूं इन्हें सिर पर बैठाकर,
बहुत बड़ी गलती हो गई इन्हें अपना बनाकर,
सोचती हूं धीरे से धक्का दे दूं,
सारी ख्वाहिशों को आज छत पर बुलाकर।।

ये भी पा लूं मैं, हासिल ये भी हो जाए मुझे,
लगातार कोशिश की ये करवाने की, मुझे बहला फुसलाकर,
सुकून छीन गया मेरा, रातों की नींद भी चली गई,
अब पूछे इनसे कोई की क्या हासिल कर लिया इन्होंने मुझसे ये सब करवाकर।।
बहुत मजबूर किया इन्होंने मुझे, की बस इन पर ध्यान दूं, अपना सब कुछ भुलाकर,
एक अनचाही दौड़ में शामिल हो जाऊं, अपना सब गंवाकर,
इन्हें कौन समझाए ये की जिनके पास कुछ नहीं होता,
कोई झांकता तक नहीं हैं उनकी चौखट पर आकर।।
हां, मैने सब किया इनकी बातों में आकर,
अब तलाश है खुद की, खुद ही अपनी पहचान मिटाकर,
आंसू छुपाने की कोशिश की है मैने, अपने आप को बारिश में भिगोकर,
लेकिन अब सोचती हूं, धीरे से धक्का दे दूं,
सारी ख्वाहिशों को आज छत पर बुलाकर ।।

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

Last day

 Hlo, friends..

Last day of the year confessions:-

Aaj 2020 ka akhiri din hai...

Jo log mere apne hai ya mere liye matter krte hai...unke liye mene last day of year confession kiya.

Aaj socha pure saal mujhe pareshaan krne wala...mujhe beintehaa khush krne wala...bechain krne wala...mere saath rone wala...jo ek cute sa Masum sa dil hai uske liye bhi aaj ek confession hai...

Socha smjha du ..taki aane wale saal me ye khud ko sambhalna sikh jaye aur naye saal me naye sapne saja ske unhe pura krne ka junoon apne ander paida kr ske..

So let's get start

Aye Dil sambhal ja zara  vrna bhut thokarein khayega

Kuch hasil na hoga tujhe ...akhir tadap kr rh jayega


Zindgi ka tana- bana tu kbhi na bun payega..

Jisko samjhega tu aapna ,,,,usko khud se bhut dur tu payega


Is bechaini ke badle me...sukun tera lut jayega...

Raaton ko jagega tu...phir chain kbhi na payega....


Zindgi ki ye pheli aye dil tu kbhi samjh payega

Is hasin khwab ke badle. ...aapni jaan tu gwayega.....

Jitni roshan karega unko ....duna andera tu payega....

Dhoke ki is dori ka phir .....tu ek moti bn jayega....

Raaton ko siskega jb tu,,,,koi paas na aayega.. ..


In nkli riston ki dhup me...phir aapne per jalayega

Aapne saath tu kuch nhi. ,,,,bus chnd yaadein le jayega.  .

Do din royenge apne pr phir tu bhula diya jayega


Jb tk tu chup hai ....aye dil khub saraha jayega

Chaht koi jo tune kr li

Phir bemout hi maara jayega

.

Viswaas kiya jo kbhi kisi ka---to tut kr bikhar jayega

Agr gir gya nazaron me khud ki ....kabhi na phir tu uth payega

Ab to sambhal ja aye dil....vrna tukdon me bikr jayega.....

Kuch hasil na hoga tujhe ....akhir tadap kr rh jayega......

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

वादा

 हैलो फ्रेंड्स ...कैसे है आप...आशा करती हूं आप सब इस महामारी के बीच सुरक्षित होंगे..
क्या लगता है आपको हम कब खुल कर सांस ले पाएंगे ? कब ये कह पाएंगे कि मास्क के बिना भी जीवन संभव है😀 ।।
वैसे कभी कभी ज़िन्दगी में वो मोड़ भी आते है जहां दम घुटने का कारण कोरोना नहीं होता, बल्कि हमारे कुछ "काश" और कुछ "पर" उसका मुख्य कारण होते है।।
कभी कभी चाहे अनचाहे किसी के लिए बहुत कर रहे होते है, और ये भी मान रहे होते है की किसी से उम्मीद नहीं करनी चाहिए लेकिन ....ये दिल ना किसी ना किसी कोने में वो उम्मीद वाली लौ जला ही लेता है जो जल तो रही होती है लेकिन साथ में जला भी रही होती है।।
हम चाहते है कि अगर हम किसी को अपना 100 पर्सेंट दे रहे है तो सामने वाला कम से कम 50 पर्सेंट तो दे।। लेकिन ऐसा होता नहीं है क्योंकि करना तो उसे वो है जो वो करना चाहता है, फिर एक पल ऐसा आता है जब हम अपनी एक पूरी सी कोशिश कर लेना चाहते है अपनी बात समझाने की, और उसकी समझने की....
आज कुछ लाइन्स पढ़ी जो इन परिस्थितियों पर बिल्कुल सटीक बैठती है:- चलिए देखते है...


तेरे साथ ठहरने के लिए तैयार हूं,
तू साथ चलने का वादा तो कर।
तुझे अपनी पलकों पर बैठाने के लिए तैयार हूं,
तू हर दफा मुझे देख कर मुस्कुराने का वादा तो कर।
तेरे लिए पूरी दुनिया से भी लड़ने को तैयार हूं,
तू मुझसे ना रूठने का वादा तो कर।
तेरे साथ हर सुबह की चाय पीने के लिए तैयार हूं,
तू हर शाम मुझे वक्त देने का वादा तो कर।
तुझपे हर खुशी कुर्बान करने के लिए तैयार हूं,
तू मेरे हर दर्द में साथ रहने का वादा तो कर।
तेरे साथ ज़िंदगी बिताने के लिए तैयार हूं,
तू साथ निभाने का वादा तो कर।


हैप्पी बर्थडे पापा

  पापा मेरी मां के अलावा वो पहले इंसान है, जिसने मुझे हमेशा महसूस कराया कि मैं कितनी ख़ास हूं । आपने मुझे हमेशा ऐसे रखा है, जैसे मैं कोई रा...